मेरे बारे में

मंगलवार, 23 अप्रैल 2019

शनिवार, 2 मार्च 2019

आशा करता हूँ





अनंत अंतहीन हो सुखद हो भय विहीन हो ,
हो अचर  ऊष्मा प्रेम के प्रकश की।

आयु भर  का हर्ष  हो , न एक क्षण  भी व्यर्थ हो ,
हो ये जीवन यात्रा , स्वप्न के आकाश की।

हो रजनी मधु से लिपटी , दिनकर से भी हिम वर्षा  हो,
जेठ में मुस्कान ऐसी , पूस के उस मास  की.

अश्रु  से भीगे आधार हो या कुटिल व्याकुल  समय  हो,
अंत  में बस  हो विजय आत्मा की श्वास की

--आशीष


गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

जन्मदिन की सहृदय शुभांक्षाए



शक्ति हो बुद्धि का विराट सा आकार हो।
आकाश में रहो मगन,प्रसन्नता अपार हो।
विलुप्त हो अशांति संतोष का आधार हो।
कल्पना से हो परे प्रेम का परिवार हो।
वर्ष भर की हंसी ही आज का उपहार हो।
आशीष हो सौभाग्य हो और स्वास्थ्य निर्विकार हो।
- आशीष

शुभकामनाएं--


सारे अक्षर है अमिट अतुल ,अक्षरमाला अनुरोधों की।
हर अर्थ को व्यर्थ बनाती है , पड़ती छाया प्रतिरोधों की।
हठ से दुख से छल से आये, विपरीत चले जो वायु वेग
अनुकूल रूप का ले स्वरूप,बरसे खुलकर अनुराग मेघ।
निष्पक्ष निस्वार्थ निरंतर हो,माला शब्दों की वर्णों की।
हो मधुर सुगंधित अचर प्रेम , कंचन हाला हो वर्षों की।

-- आशीष 

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

नया शहर ...बैंगलोर

नया शहर ..बैंगलोर


 पहली बार बंगलौर पहुचा , लक्ष्मी जी की कृपा है तो फ्लाइट से आया। वैसे दिल्ली में तो आजकल बस स्मोग और पोलुशन की बातें ही होती है पर्यावरण के नाम पर ।
दिल्ली में तो कैब में बैठे बस २० फिट का ही दिख रहा था । लगता था की रजनीकांत ने सिगार पिया हो, या फिर विपक्ष में बैठे लोगों के  दिल सुलग रहे हैं मोदी जी के नाम पर, खैर छोड़िये ये सब।
तो सबसे पहली बात जहन में आई वो ये कि बंगलौर की हवा गज़ब की साफ़ है। पूरे एअरपोर्ट पे एकदम मस्त ताज़गी वो भी रात के 12 बजे। ऐसा लगा मानो स्वर्ग में इंद्र के दरबार का एसी मेरी तरफ स्वागत में मोड़ दिया गया। सोचा की शोरूम तो शानदार है , गोदाम भी बढ़िया ही होगा ।
बड़ी मुश्किल से एक कैब मिली, अब सरकारी सिस्टम तो जनता को सस्ता टिकाऊ ट्रांसपोर्टेशन दे नहीं पाया 70 साल के बाद भी। तो लाइसेंस दे दिया प्राइवेट कम्पनीज को की भाई आप ही संभालो जनता को, हमसे न हो पायेगा।
अब कैब वाले भी जान गए हैं की आम आदमी के पास कुछ विकल्प तो है नहीं 500 -1000 जो भी बिल बनकर आ जायेगा देंगे तो है ही, हमने भी दिया।
यहाँ आने से पहले सुना की सड़कें बड़ी ख़राब हैं, पर लगा की कानो से बेवफाई की, ऐसा कुछ नहीं है। शानदार सड़कें है यहाँ बढ़िया स्ट्रीट लाइट और फ्लाई ओवर से ढकी हुई।
वो जो बुआ जी हैं  हमारी , अरे गूगल मैप वाली !! रास्ता बताते हुए ले गयी होटल तक।
दिक्कत वैसे भाषा की भी हुई नहीं कुछ ख़ास, सब्जी वाले  भुट्टा बेचने वाले , कैब वाले इंग्लिश बोल समझ लेते हैं। काम सारा चल जाता है ।
जब अगले दिन एक दूकान में हमने बारगेनिंग भी कर  ली  , 70 रुपये छुडवा लिए, तब जाकर कुछ भरोसा जगाया अपनी अर्धांगनी के मन में सर्वाइव कर लेंगे हम लोग।
एक और बात बहुत सुनी थी ट्रैफिक के बारे में ।अब इस मामले में यहाँ का सिस्टम कुछ अलग लगा ।बाकि पूरी दुनिया में सड़क बनाने के बाद घर बनाते हैं। पर यहाँ पर छोटी छोटी कुलिया के नाम में मेन रोड फलाना  लगा दिया है, मतलब ये की घर बनाने के बाद सड़कें निकाली गयी हैं।
अपने नॉर्थ वालों को अच्छा लगेगा यहां आकर वहां से ज्यादा सिस्टेमैटिक है नम्मा बेंगलुरु।

बुधवार, 17 जनवरी 2018

लहरें 


लहरें                                                          

                                                                                                 


खिड़की से देखो तो डरती हैं ,
थोड़ा सा उकसाती हैं .
लहरें भी देती हैं धमकियाँ .

रोक रखा हो जैसे घर से निकलने को
शायद थोड़ा शर्माती हैं
इनकी भी आती हैं हिचकियाँ

आती कभी मेरे पास जो तुम
सुनाता किस्से कुछ खोने के डर जाने के
सुनकर जिनको ये लहरें भी
लेती हैं सिसकियाँ .


-  आशीष 

शनिवार, 26 जनवरी 2013

दो टुकड़े - 3



क्या गलती इन  बातों  की  जो  सोने  से  शर्माती  है .,
सारा  किस्सा  इन  आँखों   का  जो सोने  से  घबराती  है .

किसका  हिस्सा  किसकी  सूरत
दोनों  अब  याद  नही  मुझको ,
बस  तुम  हो  मेरे  हिस्से  में
जो  आँखों  में  गल  जाती  हो।


आज तो बस भीड़ में रहना है ,
कहीं खुद से मुलाकात न हो जाये ,
यही सोचकर तो सुबह से
आइना नहीं देखा।

पर्दों के पीछे रहना था
तो बुलाया क्यों था?

इतना दूर से अपना चेहरा
दिखाया क्यों था ?

मेरी आवाज सुननी  थी
तो मुझे चुप कराया  क्यों था?

आँखों  में अगर नींद नही थी तुम्हारे ?
तो रात  भर मुझे सुलाया  क्यों था ?

-आशीष

                                                     






रविवार, 25 मार्च 2012

दो टुकड़े -2


कोई वहम ही था जो इस गली में मुड़ आये ,
वरना पिछले मोड़ पे एक रास्ता और भी था।

अब क्या पैमाइश करू इस नजदीकी की,
इस रात और सुबह में बस एक झपकी का फर्क है।

मैं तो शायद न देख पता उस टूटते हुए तारे को ,
ये तो मेरा दर्द था जिसने रात भर मुझे जगाये रखा ।

न तो कोई आहट की उसने ,और न आँखों से बताया,
बस वो सारी रात उसके इंतज़ार में काट दी।

कोई आये और डुबो दे इस नदी के बीच में,
इतने दिनों के निकले हैं अब तक किनारा नहीं देखा।

बुधवार, 2 नवंबर 2011

दो टुकड़े ......................


कुछ रेत बचा के लाया हूँ इन जेबों में,
पर क्या मतलब इस सागर का जब निकले तो सूखे निकले।


लहरों में डूब के भी रेत सूखी मिली,
और धूप की गर्मी ने आँखों को सुखा दिया।

जाने कहाँ से आती है और गिरा देतीं हैं रेत पे,
बिलकुल तुम्हारी तरह ये लहरें भी किनारे तक तक ही आती हैं।

ठहरे हो जहाँ , तुम्हें रहना है वहीँ हमेशा ,
दूर तो सबसे मैं ही निकल आया हूँ।


मेरा तो पेशा ही है पीछा करना रौशनी का,
कोई भी एक जुगनू दिखाकर रात भर जगा लेता है।

कोई फूल निकलता है और रोज महकती है गली मेरी,
तभी रात में सपने नहीं आते और आँखें रहती है खुली मेरी।


-आशीष

गुरुवार, 23 जून 2011

सवालों की बारिश हुई है ...


शायद पेन की स्याही सूख गयी है,
बस कुछ निशान बाकी है कागज़ पर
और हाथ के पसीने के कुछ धब्बे भी है ,
ऐसे सादे पन्ने कौन संभालेगा ?
न जाने मुझसे क्या चाहिए?
एक भड़कीला झूठा रंग और
रंगीले फौवारे
यहाँ तो बस बेरंग चादर और दीवारें हैं,
अब ऐसे कमरे कौन सजाएगा ?
कभी रुको मेरी तकिया तुमे सुला देगी,
मेरी चादर की सिलवटें सुबह होते ही तुमे जगा देगी.
एक बार फिर मोमबत्ती तुम्हारी ओर रख दी है मैंने.
रात होगी तो देखेंगे कौन इसे जलाएगा?
दूर से आती है वो आवाज़ थकी हुई सी,
मेरे कानो में फिर से ठहरने को पूछती है.
हालाँकि थका हुआ तो मैं भी बहुत हूँ
इंतजार में बैठे -बैठे,
तो अब कौन किसे जवाब सुनाएगा?

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

एक और कोशिश ............



इस नाटक में चलो एक किरदार और सही,



आंखें जलाई हैं अब तक थोडा इंतजार और सही।






कई महीनो के ढेर लगाये हैं इस किताब में,



शायद मिलो अब सुर्ख़ियों में चलो एक अखबार और सही।






कई दिन इंतज़ार में हमने ख़राब कर दिए,



आज फिर उनकी याद में एक इतवार और सही।






हर खाते के हिसाब में घटा सहा है अब तक,



शायद मुनाफा निकले चलो एक व्यापार और सही.

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

ट्रेन के डिब्बे में..............

क्या ज्यादा जरुरत रखता है हमारे लिए? जो पीछे छूट गया या जो हम आगे आने वाले वक़्त में पाएंगे..........


कैसी दौड़ लगी है जिसमे मैं भी भागता हूँ।
खेत ,पेड़ और घर स्थिर नहीं दिखते।
जब भी बाहर झांकता हूँ.
मिटटी की खुशबु, खेतों का पानी जाने कहाँ भागते हैं ।
शायद जहाँ चमकीले रस्ते और अँधेरे जागते हैं।
कुछ सिकुड़ती और बनती रेल की ये पटरियां ,
उन बिछड़ते हाथ से बेहतर ही लगती हैं।
या सफ़र करते हुए हर बार घड़ियाँ देखकर,
हर जरुरत वक़्त की पूरी नहीं है मानता हूँ।
शायद ये बादल पीछे जायेंगे मेरी पुरानी बातों से मिलने
या मुझसे हुई दो चार गलतियाँ धुलने।
कुछ लोग सरपट से सही मंजिल तो अपनी पा गए,
उस गुज़रते वक़्त में मुस्कान अपनी खा गए।
पर सुकून है हर सफ़र के अंत में ,
आज भी दिल खोलकर मुस्कान अपनी बांटता हूँ.
---आशीष

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

छोटी सी शिकायत

एक बार अपना चेहरा तो दिखाया होता,
मेरे कान पास कुछ गुनगुनाया होता,
हर दिन लाखो बार आवाज़ देता था मैं ,
काश एक बार तुमने भी बुलाया होता,
क्या वजह है जो हर रोज़ भीगता हू मैं,
और फिर घंटो कपडे सुखाता हूँ,
घर से निकलते तो भीगते तुम भी,
बस उड़ते बदलो को इशारे से बुलाया होता,
आँखों क पीछे छुपके सोता हू मैं,
एक अँधेरे कोने में अकेले,
कह दिया झट से सुनता नहीं हूँ मैं,
बस एक बार आवाज़ देकर जगाया तो होता,,
रोशनी आती है इन घरों के पीछे से,
जैसे कोई आग के फौवारे जलाता हो,
मैं तो रुक जाता आँखों की चमक से भी,
बस एक बार तुमने पलकों को उठाया तो होता।

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

सर्दी से पहले

बाहर निकली कुछ जलती और सुलगती बातें,

शायद तपकर लाल हो गयी थी,

कितनी मुश्किल थी वो ठंडी और सिकुड़ती रातें,

शायद जागकर बेहाल हो गयी थीं,

छुपकर तब मैं सुनता था चिड़ियों की आवाजें,

उस गीली आंधी में पेड़ो की बातें,

शायद सब मुझसे परेशान हो गयी थी,

कोने में बैठा मैं देखा करता था

आते ज़ाते लोगों की परछाई को,

जो सूरज से छिपने में बेहाल हो गयी थी,

आवाजें जो सुनाई नहीं दी बातें जो सुनाई नहीं दी,

क्या मालूम था ऐसे निकलेगी मेरे सामने,

जो होठो में दबने से बेकार हो गयीं थी,

बिना कुछ खरीदे सब कुछ बिकता था,

आज से पहले जब हम भीड़ में रहते थे,

पर बीते कुछ दिनों से वोह सारी बस्तियां बाज़ार हो गयी थीं.

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

चेहरा..

एक चेहरे में दूसरा चेहरा दीखता है
ये मन हेर रोज कुछ नया लिखता है
हर बात एक नई याद बनती है
हर याद पे वक़्त का पहरा रहता है।
हर चेहरा जाने कितने नकाब रखता है
और न जाने कौन सा हमें दीखता है।
हर चेहरे के पीछे कुछ यादें है कुछ बाते है
उन यादो में वो चेहरा छुपता है।
वोह चेहरा जिसको हमने सालो पहले खोया था
हर रस्ते में हर रिश्ते में वोह चेहरा हमको दिखता है
पर क्या खोया चेहरा वापस मिलता है।
बस चेहरे का रंग यादो में घुलता है.





मुलाकात...

इतना आसान नहीं थी वोह मुलाकात ज़रा भी नाकाम नहीं थी।
मेरी हेर बात का मतलब समझ लिया शुरुआत से ही वोह कोई नादान नहीं थी।
सजा लेना या बहा देना इस किताब को मेरी वोह स्याही थी बड़ी हलकी पैर बेईमान नहीं थी.

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009