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बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

ट्रेन के डिब्बे में..............

क्या ज्यादा जरुरत रखता है हमारे लिए? जो पीछे छूट गया या जो हम आगे आने वाले वक़्त में पाएंगे..........


कैसी दौड़ लगी है जिसमे मैं भी भागता हूँ।
खेत ,पेड़ और घर स्थिर नहीं दिखते।
जब भी बाहर झांकता हूँ.
मिटटी की खुशबु, खेतों का पानी जाने कहाँ भागते हैं ।
शायद जहाँ चमकीले रस्ते और अँधेरे जागते हैं।
कुछ सिकुड़ती और बनती रेल की ये पटरियां ,
उन बिछड़ते हाथ से बेहतर ही लगती हैं।
या सफ़र करते हुए हर बार घड़ियाँ देखकर,
हर जरुरत वक़्त की पूरी नहीं है मानता हूँ।
शायद ये बादल पीछे जायेंगे मेरी पुरानी बातों से मिलने
या मुझसे हुई दो चार गलतियाँ धुलने।
कुछ लोग सरपट से सही मंजिल तो अपनी पा गए,
उस गुज़रते वक़्त में मुस्कान अपनी खा गए।
पर सुकून है हर सफ़र के अंत में ,
आज भी दिल खोलकर मुस्कान अपनी बांटता हूँ.
---आशीष

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