अनंत अंतहीन हो सुखद हो भय विहीन हो ,
हो अचर ऊष्मा प्रेम के प्रकश की।
आयु भर का हर्ष हो , न एक क्षण भी व्यर्थ हो ,
हो ये जीवन यात्रा , स्वप्न के आकाश की।
हो रजनी मधु से लिपटी , दिनकर से भी हिम वर्षा हो,
जेठ में मुस्कान ऐसी , पूस के उस मास की.
अश्रु से भीगे आधार हो या कुटिल व्याकुल समय हो,
अंत में बस हो विजय आत्मा की श्वास की
--आशीष

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