लहरें
खिड़की से देखो तो डरती हैं ,
थोड़ा सा उकसाती हैं .
लहरें भी देती हैं धमकियाँ .
रोक रखा हो जैसे घर से निकलने को
शायद थोड़ा शर्माती हैं
इनकी भी आती हैं हिचकियाँ
आती कभी मेरे पास जो तुम
सुनाता किस्से कुछ खोने के डर जाने के
सुनकर जिनको ये लहरें भी
लेती हैं सिसकियाँ .
- आशीष
Nice poem... 😊
जवाब देंहटाएंधन्यवाद भाई
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