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बुधवार, 17 जनवरी 2018

लहरें 


लहरें                                                          

                                                                                                 


खिड़की से देखो तो डरती हैं ,
थोड़ा सा उकसाती हैं .
लहरें भी देती हैं धमकियाँ .

रोक रखा हो जैसे घर से निकलने को
शायद थोड़ा शर्माती हैं
इनकी भी आती हैं हिचकियाँ

आती कभी मेरे पास जो तुम
सुनाता किस्से कुछ खोने के डर जाने के
सुनकर जिनको ये लहरें भी
लेती हैं सिसकियाँ .


-  आशीष 

शनिवार, 26 जनवरी 2013

दो टुकड़े - 3



क्या गलती इन  बातों  की  जो  सोने  से  शर्माती  है .,
सारा  किस्सा  इन  आँखों   का  जो सोने  से  घबराती  है .

किसका  हिस्सा  किसकी  सूरत
दोनों  अब  याद  नही  मुझको ,
बस  तुम  हो  मेरे  हिस्से  में
जो  आँखों  में  गल  जाती  हो।


आज तो बस भीड़ में रहना है ,
कहीं खुद से मुलाकात न हो जाये ,
यही सोचकर तो सुबह से
आइना नहीं देखा।

पर्दों के पीछे रहना था
तो बुलाया क्यों था?

इतना दूर से अपना चेहरा
दिखाया क्यों था ?

मेरी आवाज सुननी  थी
तो मुझे चुप कराया  क्यों था?

आँखों  में अगर नींद नही थी तुम्हारे ?
तो रात  भर मुझे सुलाया  क्यों था ?

-आशीष

                                                     






रविवार, 25 मार्च 2012

दो टुकड़े -2


कोई वहम ही था जो इस गली में मुड़ आये ,
वरना पिछले मोड़ पे एक रास्ता और भी था।

अब क्या पैमाइश करू इस नजदीकी की,
इस रात और सुबह में बस एक झपकी का फर्क है।

मैं तो शायद न देख पता उस टूटते हुए तारे को ,
ये तो मेरा दर्द था जिसने रात भर मुझे जगाये रखा ।

न तो कोई आहट की उसने ,और न आँखों से बताया,
बस वो सारी रात उसके इंतज़ार में काट दी।

कोई आये और डुबो दे इस नदी के बीच में,
इतने दिनों के निकले हैं अब तक किनारा नहीं देखा।

बुधवार, 2 नवंबर 2011

दो टुकड़े ......................


कुछ रेत बचा के लाया हूँ इन जेबों में,
पर क्या मतलब इस सागर का जब निकले तो सूखे निकले।


लहरों में डूब के भी रेत सूखी मिली,
और धूप की गर्मी ने आँखों को सुखा दिया।

जाने कहाँ से आती है और गिरा देतीं हैं रेत पे,
बिलकुल तुम्हारी तरह ये लहरें भी किनारे तक तक ही आती हैं।

ठहरे हो जहाँ , तुम्हें रहना है वहीँ हमेशा ,
दूर तो सबसे मैं ही निकल आया हूँ।


मेरा तो पेशा ही है पीछा करना रौशनी का,
कोई भी एक जुगनू दिखाकर रात भर जगा लेता है।

कोई फूल निकलता है और रोज महकती है गली मेरी,
तभी रात में सपने नहीं आते और आँखें रहती है खुली मेरी।


-आशीष

गुरुवार, 23 जून 2011

सवालों की बारिश हुई है ...


शायद पेन की स्याही सूख गयी है,
बस कुछ निशान बाकी है कागज़ पर
और हाथ के पसीने के कुछ धब्बे भी है ,
ऐसे सादे पन्ने कौन संभालेगा ?
न जाने मुझसे क्या चाहिए?
एक भड़कीला झूठा रंग और
रंगीले फौवारे
यहाँ तो बस बेरंग चादर और दीवारें हैं,
अब ऐसे कमरे कौन सजाएगा ?
कभी रुको मेरी तकिया तुमे सुला देगी,
मेरी चादर की सिलवटें सुबह होते ही तुमे जगा देगी.
एक बार फिर मोमबत्ती तुम्हारी ओर रख दी है मैंने.
रात होगी तो देखेंगे कौन इसे जलाएगा?
दूर से आती है वो आवाज़ थकी हुई सी,
मेरे कानो में फिर से ठहरने को पूछती है.
हालाँकि थका हुआ तो मैं भी बहुत हूँ
इंतजार में बैठे -बैठे,
तो अब कौन किसे जवाब सुनाएगा?

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

एक और कोशिश ............



इस नाटक में चलो एक किरदार और सही,



आंखें जलाई हैं अब तक थोडा इंतजार और सही।






कई महीनो के ढेर लगाये हैं इस किताब में,



शायद मिलो अब सुर्ख़ियों में चलो एक अखबार और सही।






कई दिन इंतज़ार में हमने ख़राब कर दिए,



आज फिर उनकी याद में एक इतवार और सही।






हर खाते के हिसाब में घटा सहा है अब तक,



शायद मुनाफा निकले चलो एक व्यापार और सही.

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

ट्रेन के डिब्बे में..............

क्या ज्यादा जरुरत रखता है हमारे लिए? जो पीछे छूट गया या जो हम आगे आने वाले वक़्त में पाएंगे..........


कैसी दौड़ लगी है जिसमे मैं भी भागता हूँ।
खेत ,पेड़ और घर स्थिर नहीं दिखते।
जब भी बाहर झांकता हूँ.
मिटटी की खुशबु, खेतों का पानी जाने कहाँ भागते हैं ।
शायद जहाँ चमकीले रस्ते और अँधेरे जागते हैं।
कुछ सिकुड़ती और बनती रेल की ये पटरियां ,
उन बिछड़ते हाथ से बेहतर ही लगती हैं।
या सफ़र करते हुए हर बार घड़ियाँ देखकर,
हर जरुरत वक़्त की पूरी नहीं है मानता हूँ।
शायद ये बादल पीछे जायेंगे मेरी पुरानी बातों से मिलने
या मुझसे हुई दो चार गलतियाँ धुलने।
कुछ लोग सरपट से सही मंजिल तो अपनी पा गए,
उस गुज़रते वक़्त में मुस्कान अपनी खा गए।
पर सुकून है हर सफ़र के अंत में ,
आज भी दिल खोलकर मुस्कान अपनी बांटता हूँ.
---आशीष