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शनिवार, 26 जनवरी 2013

दो टुकड़े - 3



क्या गलती इन  बातों  की  जो  सोने  से  शर्माती  है .,
सारा  किस्सा  इन  आँखों   का  जो सोने  से  घबराती  है .

किसका  हिस्सा  किसकी  सूरत
दोनों  अब  याद  नही  मुझको ,
बस  तुम  हो  मेरे  हिस्से  में
जो  आँखों  में  गल  जाती  हो।


आज तो बस भीड़ में रहना है ,
कहीं खुद से मुलाकात न हो जाये ,
यही सोचकर तो सुबह से
आइना नहीं देखा।

पर्दों के पीछे रहना था
तो बुलाया क्यों था?

इतना दूर से अपना चेहरा
दिखाया क्यों था ?

मेरी आवाज सुननी  थी
तो मुझे चुप कराया  क्यों था?

आँखों  में अगर नींद नही थी तुम्हारे ?
तो रात  भर मुझे सुलाया  क्यों था ?

-आशीष

                                                     






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