क्या गलती इन बातों की जो सोने से शर्माती है .,
सारा किस्सा इन आँखों का जो सोने से घबराती है .किसका हिस्सा किसकी सूरत
दोनों अब याद नही मुझको ,
बस तुम हो मेरे हिस्से में
जो आँखों में गल जाती हो।
आज तो बस भीड़ में रहना है ,
कहीं खुद से मुलाकात न हो जाये ,
यही सोचकर तो सुबह से
आइना नहीं देखा।
पर्दों के पीछे रहना था
तो बुलाया क्यों था?
इतना दूर से अपना चेहरा
दिखाया क्यों था ?
मेरी आवाज सुननी थी
तो मुझे चुप कराया क्यों था?
आँखों में अगर नींद नही थी तुम्हारे ?
तो रात भर मुझे सुलाया क्यों था ?
-आशीष




