
कोई वहम ही था जो इस गली में मुड़ आये ,
वरना पिछले मोड़ पे एक रास्ता और भी था।
अब क्या पैमाइश करू इस नजदीकी की,
इस रात और सुबह में बस एक झपकी का फर्क है।
मैं तो शायद न देख पता उस टूटते हुए तारे को ,
ये तो मेरा दर्द था जिसने रात भर मुझे जगाये रखा ।
न तो कोई आहट की उसने ,और न आँखों से बताया,
बस वो सारी रात उसके इंतज़ार में काट दी।
कोई आये और डुबो दे इस नदी के बीच में,
इतने दिनों के निकले हैं अब तक किनारा नहीं देखा।



