मेरे बारे में

गुरुवार, 23 जून 2011

सवालों की बारिश हुई है ...


शायद पेन की स्याही सूख गयी है,
बस कुछ निशान बाकी है कागज़ पर
और हाथ के पसीने के कुछ धब्बे भी है ,
ऐसे सादे पन्ने कौन संभालेगा ?
न जाने मुझसे क्या चाहिए?
एक भड़कीला झूठा रंग और
रंगीले फौवारे
यहाँ तो बस बेरंग चादर और दीवारें हैं,
अब ऐसे कमरे कौन सजाएगा ?
कभी रुको मेरी तकिया तुमे सुला देगी,
मेरी चादर की सिलवटें सुबह होते ही तुमे जगा देगी.
एक बार फिर मोमबत्ती तुम्हारी ओर रख दी है मैंने.
रात होगी तो देखेंगे कौन इसे जलाएगा?
दूर से आती है वो आवाज़ थकी हुई सी,
मेरे कानो में फिर से ठहरने को पूछती है.
हालाँकि थका हुआ तो मैं भी बहुत हूँ
इंतजार में बैठे -बैठे,
तो अब कौन किसे जवाब सुनाएगा?

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

एक और कोशिश ............



इस नाटक में चलो एक किरदार और सही,



आंखें जलाई हैं अब तक थोडा इंतजार और सही।






कई महीनो के ढेर लगाये हैं इस किताब में,



शायद मिलो अब सुर्ख़ियों में चलो एक अखबार और सही।






कई दिन इंतज़ार में हमने ख़राब कर दिए,



आज फिर उनकी याद में एक इतवार और सही।






हर खाते के हिसाब में घटा सहा है अब तक,



शायद मुनाफा निकले चलो एक व्यापार और सही.

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

ट्रेन के डिब्बे में..............

क्या ज्यादा जरुरत रखता है हमारे लिए? जो पीछे छूट गया या जो हम आगे आने वाले वक़्त में पाएंगे..........


कैसी दौड़ लगी है जिसमे मैं भी भागता हूँ।
खेत ,पेड़ और घर स्थिर नहीं दिखते।
जब भी बाहर झांकता हूँ.
मिटटी की खुशबु, खेतों का पानी जाने कहाँ भागते हैं ।
शायद जहाँ चमकीले रस्ते और अँधेरे जागते हैं।
कुछ सिकुड़ती और बनती रेल की ये पटरियां ,
उन बिछड़ते हाथ से बेहतर ही लगती हैं।
या सफ़र करते हुए हर बार घड़ियाँ देखकर,
हर जरुरत वक़्त की पूरी नहीं है मानता हूँ।
शायद ये बादल पीछे जायेंगे मेरी पुरानी बातों से मिलने
या मुझसे हुई दो चार गलतियाँ धुलने।
कुछ लोग सरपट से सही मंजिल तो अपनी पा गए,
उस गुज़रते वक़्त में मुस्कान अपनी खा गए।
पर सुकून है हर सफ़र के अंत में ,
आज भी दिल खोलकर मुस्कान अपनी बांटता हूँ.
---आशीष

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

छोटी सी शिकायत

एक बार अपना चेहरा तो दिखाया होता,
मेरे कान पास कुछ गुनगुनाया होता,
हर दिन लाखो बार आवाज़ देता था मैं ,
काश एक बार तुमने भी बुलाया होता,
क्या वजह है जो हर रोज़ भीगता हू मैं,
और फिर घंटो कपडे सुखाता हूँ,
घर से निकलते तो भीगते तुम भी,
बस उड़ते बदलो को इशारे से बुलाया होता,
आँखों क पीछे छुपके सोता हू मैं,
एक अँधेरे कोने में अकेले,
कह दिया झट से सुनता नहीं हूँ मैं,
बस एक बार आवाज़ देकर जगाया तो होता,,
रोशनी आती है इन घरों के पीछे से,
जैसे कोई आग के फौवारे जलाता हो,
मैं तो रुक जाता आँखों की चमक से भी,
बस एक बार तुमने पलकों को उठाया तो होता।

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

सर्दी से पहले

बाहर निकली कुछ जलती और सुलगती बातें,

शायद तपकर लाल हो गयी थी,

कितनी मुश्किल थी वो ठंडी और सिकुड़ती रातें,

शायद जागकर बेहाल हो गयी थीं,

छुपकर तब मैं सुनता था चिड़ियों की आवाजें,

उस गीली आंधी में पेड़ो की बातें,

शायद सब मुझसे परेशान हो गयी थी,

कोने में बैठा मैं देखा करता था

आते ज़ाते लोगों की परछाई को,

जो सूरज से छिपने में बेहाल हो गयी थी,

आवाजें जो सुनाई नहीं दी बातें जो सुनाई नहीं दी,

क्या मालूम था ऐसे निकलेगी मेरे सामने,

जो होठो में दबने से बेकार हो गयीं थी,

बिना कुछ खरीदे सब कुछ बिकता था,

आज से पहले जब हम भीड़ में रहते थे,

पर बीते कुछ दिनों से वोह सारी बस्तियां बाज़ार हो गयी थीं.

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

चेहरा..

एक चेहरे में दूसरा चेहरा दीखता है
ये मन हेर रोज कुछ नया लिखता है
हर बात एक नई याद बनती है
हर याद पे वक़्त का पहरा रहता है।
हर चेहरा जाने कितने नकाब रखता है
और न जाने कौन सा हमें दीखता है।
हर चेहरे के पीछे कुछ यादें है कुछ बाते है
उन यादो में वो चेहरा छुपता है।
वोह चेहरा जिसको हमने सालो पहले खोया था
हर रस्ते में हर रिश्ते में वोह चेहरा हमको दिखता है
पर क्या खोया चेहरा वापस मिलता है।
बस चेहरे का रंग यादो में घुलता है.





मुलाकात...

इतना आसान नहीं थी वोह मुलाकात ज़रा भी नाकाम नहीं थी।
मेरी हेर बात का मतलब समझ लिया शुरुआत से ही वोह कोई नादान नहीं थी।
सजा लेना या बहा देना इस किताब को मेरी वोह स्याही थी बड़ी हलकी पैर बेईमान नहीं थी.