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मंगलवार, 30 जनवरी 2018

नया शहर ...बैंगलोर

नया शहर ..बैंगलोर


 पहली बार बंगलौर पहुचा , लक्ष्मी जी की कृपा है तो फ्लाइट से आया। वैसे दिल्ली में तो आजकल बस स्मोग और पोलुशन की बातें ही होती है पर्यावरण के नाम पर ।
दिल्ली में तो कैब में बैठे बस २० फिट का ही दिख रहा था । लगता था की रजनीकांत ने सिगार पिया हो, या फिर विपक्ष में बैठे लोगों के  दिल सुलग रहे हैं मोदी जी के नाम पर, खैर छोड़िये ये सब।
तो सबसे पहली बात जहन में आई वो ये कि बंगलौर की हवा गज़ब की साफ़ है। पूरे एअरपोर्ट पे एकदम मस्त ताज़गी वो भी रात के 12 बजे। ऐसा लगा मानो स्वर्ग में इंद्र के दरबार का एसी मेरी तरफ स्वागत में मोड़ दिया गया। सोचा की शोरूम तो शानदार है , गोदाम भी बढ़िया ही होगा ।
बड़ी मुश्किल से एक कैब मिली, अब सरकारी सिस्टम तो जनता को सस्ता टिकाऊ ट्रांसपोर्टेशन दे नहीं पाया 70 साल के बाद भी। तो लाइसेंस दे दिया प्राइवेट कम्पनीज को की भाई आप ही संभालो जनता को, हमसे न हो पायेगा।
अब कैब वाले भी जान गए हैं की आम आदमी के पास कुछ विकल्प तो है नहीं 500 -1000 जो भी बिल बनकर आ जायेगा देंगे तो है ही, हमने भी दिया।
यहाँ आने से पहले सुना की सड़कें बड़ी ख़राब हैं, पर लगा की कानो से बेवफाई की, ऐसा कुछ नहीं है। शानदार सड़कें है यहाँ बढ़िया स्ट्रीट लाइट और फ्लाई ओवर से ढकी हुई।
वो जो बुआ जी हैं  हमारी , अरे गूगल मैप वाली !! रास्ता बताते हुए ले गयी होटल तक।
दिक्कत वैसे भाषा की भी हुई नहीं कुछ ख़ास, सब्जी वाले  भुट्टा बेचने वाले , कैब वाले इंग्लिश बोल समझ लेते हैं। काम सारा चल जाता है ।
जब अगले दिन एक दूकान में हमने बारगेनिंग भी कर  ली  , 70 रुपये छुडवा लिए, तब जाकर कुछ भरोसा जगाया अपनी अर्धांगनी के मन में सर्वाइव कर लेंगे हम लोग।
एक और बात बहुत सुनी थी ट्रैफिक के बारे में ।अब इस मामले में यहाँ का सिस्टम कुछ अलग लगा ।बाकि पूरी दुनिया में सड़क बनाने के बाद घर बनाते हैं। पर यहाँ पर छोटी छोटी कुलिया के नाम में मेन रोड फलाना  लगा दिया है, मतलब ये की घर बनाने के बाद सड़कें निकाली गयी हैं।
अपने नॉर्थ वालों को अच्छा लगेगा यहां आकर वहां से ज्यादा सिस्टेमैटिक है नम्मा बेंगलुरु।

बुधवार, 17 जनवरी 2018

लहरें 


लहरें                                                          

                                                                                                 


खिड़की से देखो तो डरती हैं ,
थोड़ा सा उकसाती हैं .
लहरें भी देती हैं धमकियाँ .

रोक रखा हो जैसे घर से निकलने को
शायद थोड़ा शर्माती हैं
इनकी भी आती हैं हिचकियाँ

आती कभी मेरे पास जो तुम
सुनाता किस्से कुछ खोने के डर जाने के
सुनकर जिनको ये लहरें भी
लेती हैं सिसकियाँ .


-  आशीष