
कुछ रेत बचा के लाया हूँ इन जेबों में,
पर क्या मतलब इस सागर का जब निकले तो सूखे निकले।
लहरों में डूब के भी रेत सूखी मिली,
और धूप की गर्मी ने आँखों को सुखा दिया।
जाने कहाँ से आती है और गिरा देतीं हैं रेत पे,
बिलकुल तुम्हारी तरह ये लहरें भी किनारे तक तक ही आती हैं।
ठहरे हो जहाँ , तुम्हें रहना है वहीँ हमेशा ,
दूर तो सबसे मैं ही निकल आया हूँ।
मेरा तो पेशा ही है पीछा करना रौशनी का,
कोई भी एक जुगनू दिखाकर रात भर जगा लेता है।
कोई फूल निकलता है और रोज महकती है गली मेरी,
तभी रात में सपने नहीं आते और आँखें रहती है खुली मेरी।
-आशीष

Pure emotions ...not only i can read it bt i can feel it..superb buddy
जवाब देंहटाएंya brother...........
जवाब देंहटाएंBahut sundar aur gehan...:)
जवाब देंहटाएंविलम्ब के लिए क्षमा। पर धन्यवाद
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