मेरे बारे में

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

सर्दी से पहले

बाहर निकली कुछ जलती और सुलगती बातें,

शायद तपकर लाल हो गयी थी,

कितनी मुश्किल थी वो ठंडी और सिकुड़ती रातें,

शायद जागकर बेहाल हो गयी थीं,

छुपकर तब मैं सुनता था चिड़ियों की आवाजें,

उस गीली आंधी में पेड़ो की बातें,

शायद सब मुझसे परेशान हो गयी थी,

कोने में बैठा मैं देखा करता था

आते ज़ाते लोगों की परछाई को,

जो सूरज से छिपने में बेहाल हो गयी थी,

आवाजें जो सुनाई नहीं दी बातें जो सुनाई नहीं दी,

क्या मालूम था ऐसे निकलेगी मेरे सामने,

जो होठो में दबने से बेकार हो गयीं थी,

बिना कुछ खरीदे सब कुछ बिकता था,

आज से पहले जब हम भीड़ में रहते थे,

पर बीते कुछ दिनों से वोह सारी बस्तियां बाज़ार हो गयी थीं.

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