बाहर निकली कुछ जलती और सुलगती बातें,
शायद तपकर लाल हो गयी थी,
कितनी मुश्किल थी वो ठंडी और सिकुड़ती रातें,
शायद जागकर बेहाल हो गयी थीं,
छुपकर तब मैं सुनता था चिड़ियों की आवाजें,
उस गीली आंधी में पेड़ो की बातें,
शायद सब मुझसे परेशान हो गयी थी,
कोने में बैठा मैं देखा करता था
आते ज़ाते लोगों की परछाई को,
जो सूरज से छिपने में बेहाल हो गयी थी,
आवाजें जो सुनाई नहीं दी बातें जो सुनाई नहीं दी,
क्या मालूम था ऐसे निकलेगी मेरे सामने,
जो होठो में दबने से बेकार हो गयीं थी,
बिना कुछ खरीदे सब कुछ बिकता था,
आज से पहले जब हम भीड़ में रहते थे,
पर बीते कुछ दिनों से वोह सारी बस्तियां बाज़ार हो गयी थीं.

kaha se copy kiya hai.............
जवाब देंहटाएंwaiseacha hai
arre bhai meri hai!ab tujhe bhi copyright dikhana padega!
जवाब देंहटाएंyou reminded me of gulzaar ..gr8 work
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