मेरे बारे में

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

चेहरा..

एक चेहरे में दूसरा चेहरा दीखता है
ये मन हेर रोज कुछ नया लिखता है
हर बात एक नई याद बनती है
हर याद पे वक़्त का पहरा रहता है।
हर चेहरा जाने कितने नकाब रखता है
और न जाने कौन सा हमें दीखता है।
हर चेहरे के पीछे कुछ यादें है कुछ बाते है
उन यादो में वो चेहरा छुपता है।
वोह चेहरा जिसको हमने सालो पहले खोया था
हर रस्ते में हर रिश्ते में वोह चेहरा हमको दिखता है
पर क्या खोया चेहरा वापस मिलता है।
बस चेहरे का रंग यादो में घुलता है.





मुलाकात...

इतना आसान नहीं थी वोह मुलाकात ज़रा भी नाकाम नहीं थी।
मेरी हेर बात का मतलब समझ लिया शुरुआत से ही वोह कोई नादान नहीं थी।
सजा लेना या बहा देना इस किताब को मेरी वोह स्याही थी बड़ी हलकी पैर बेईमान नहीं थी.

मंगलवार, 22 दिसंबर 2009