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शनिवार, 30 अप्रैल 2011

एक और कोशिश ............



इस नाटक में चलो एक किरदार और सही,



आंखें जलाई हैं अब तक थोडा इंतजार और सही।






कई महीनो के ढेर लगाये हैं इस किताब में,



शायद मिलो अब सुर्ख़ियों में चलो एक अखबार और सही।






कई दिन इंतज़ार में हमने ख़राब कर दिए,



आज फिर उनकी याद में एक इतवार और सही।






हर खाते के हिसाब में घटा सहा है अब तक,



शायद मुनाफा निकले चलो एक व्यापार और सही.