एक बार अपना चेहरा तो दिखाया होता,
मेरे कान पास कुछ गुनगुनाया होता,
हर दिन लाखो बार आवाज़ देता था मैं ,
काश एक बार तुमने भी बुलाया होता,
क्या वजह है जो हर रोज़ भीगता हू मैं,
और फिर घंटो कपडे सुखाता हूँ,
घर से निकलते तो भीगते तुम भी,
बस उड़ते बदलो को इशारे से बुलाया होता,
आँखों क पीछे छुपके सोता हू मैं,
एक अँधेरे कोने में अकेले,
कह दिया झट से सुनता नहीं हूँ मैं,
बस एक बार आवाज़ देकर जगाया तो होता,,
रोशनी आती है इन घरों के पीछे से,
जैसे कोई आग के फौवारे जलाता हो,
मैं तो रुक जाता आँखों की चमक से भी,
बस एक बार तुमने पलकों को उठाया तो होता।
शुक्रवार, 28 जनवरी 2011
मंगलवार, 18 जनवरी 2011
सर्दी से पहले
बाहर निकली कुछ जलती और सुलगती बातें,
शायद तपकर लाल हो गयी थी,
कितनी मुश्किल थी वो ठंडी और सिकुड़ती रातें,
शायद जागकर बेहाल हो गयी थीं,
छुपकर तब मैं सुनता था चिड़ियों की आवाजें,
उस गीली आंधी में पेड़ो की बातें,
शायद सब मुझसे परेशान हो गयी थी,
कोने में बैठा मैं देखा करता था
आते ज़ाते लोगों की परछाई को,
जो सूरज से छिपने में बेहाल हो गयी थी,
आवाजें जो सुनाई नहीं दी बातें जो सुनाई नहीं दी,
क्या मालूम था ऐसे निकलेगी मेरे सामने,
जो होठो में दबने से बेकार हो गयीं थी,
बिना कुछ खरीदे सब कुछ बिकता था,
आज से पहले जब हम भीड़ में रहते थे,
पर बीते कुछ दिनों से वोह सारी बस्तियां बाज़ार हो गयी थीं.
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